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Hunkkaar The Roar Review: अनीत पड्डा की सीरीज कैसी है?

Key facts about this title
Title Hunkkaar The Roar
Director नित्या मेहरा, करण डी. कपाड़िया
Writer हीराज़ मारफतिया, रविंदर रंधावा
Cast अनीत पड्डा, फातिमा सना शेख, रघुबीर यादव, मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब, राम कपूर, अर्जुन माथुर, ज़ोया हुसैन, राजेश शर्मा
Genre Crime, Drama, Thriller / Social-Legal Thriller
Language हिंदी
Certificate A
Released September 25, 2026
Where to watch JioHotstar
Our score 3.5 / 5
3.5 /5 One-time watch
Story 3
Acting 4
Direction 3.5
Visuals 3.5
Music 3
Entertainment 3.5

सीरीज 25 सितंबर 2026 को JioHotstar पर एक साथ रिलीज हुई। इसके छह एपिसोड हैं और आखिरी एपिसोड करीब 66 मिनट का है।

देखूँ या नहीं?

देख सकते हैं, लेकिन उम्मीदें सही रखिए। 6 एपिसोड और कुल लगभग 5 घंटे 43 मिनट की इस सीरीज में अनीत पड्डा, फातिमा सना शेख और रघुबीर यादव की एक्टिंग देखने लायक है। मुद्दा गंभीर है, कोर्टरूम और जांच वाले हिस्से अच्छे हैं, लेकिन कहानी इतनी नई नहीं है कि हर ट्विस्ट आपको चौंका दे।

Hunkkaar The Roar Review

हुंकार: द रोअर किस बारे में है? Spoiler-Free

कहानी मध्य प्रदेश के एक छोटे शहर के उस माहौल में शुरू होती है जहां धर्म, आस्था और एक बेहद ताकतवर आध्यात्मिक गुरु की पकड़ आम लोगों से लेकर सिस्टम तक दिखाई देती है।

17 साल की मीनू रावत एक गंभीर अपराध का आरोप लगाती है। मामला पुलिस तक पहुंचता है, लेकिन मुश्किल सिर्फ अपराध की जांच करना नहीं है। सामने ऐसा आदमी है जिसके नाम से पुलिस, प्रशासन, राजनीति, मीडिया और आम लोगों के व्यवहार तक बदल जाते हैं।

यहीं से हुंकार अपनी असली कहानी शुरू करती है।

शो सिर्फ यह सवाल नहीं पूछता कि अपराध हुआ या नहीं। वह यह भी पूछता है कि जब किसी आरोपी के पास पैसा, अनुयायी, प्रभाव और सिस्टम तक पहुंच हो तो सच की जांच कितनी मुश्किल हो जाती है।

और इससे भी असहज सवाल है कि समाज किसी पीड़ित की बात सुनने से पहले उसी से सवाल क्यों करने लगता है?

सीरीज का सेटअप पहले दो एपिसोड में काफी साफ हो जाता है। आपको जल्दी समझ आ जाता है कि यह सिर्फ एक पुलिस केस नहीं रहने वाला। मामला कोर्ट, मीडिया, आस्था और सत्ता तक जाएगा।

Episode-wise Pacing: कहाँ पकड़ती है, कहाँ छूटती है

Episode 1 सबसे जरूरी काम कर देता है। यह आपको तुरंत कहानी के conflict में डाल देता है। शुरुआत से ही माहौल uncomfortable है और पुलिस स्टेशन वाला सेटअप यह समझा देता है कि जिस आदमी पर आरोप लगा है, उससे टकराना सामान्य केस नहीं है।

लेकिन यहीं एक दिक्कत भी शुरू हो जाती है। शो का central mystery उतना mysterious नहीं है। आपने इस तरह के godman-based crime dramas पहले देखे हैं, इसलिए कई जगह आपको अंदाजा लगने लगता है कि कहानी किस दिशा में जाएगी।

Episode 2 में investigation और courtroom वाला हिस्सा कहानी को दूसरी गति देता है। यहां Fatima Sana Shaikh का पुलिस अधिकारी वाला track खास तौर पर काम करता है। शो सिर्फ victim और accused के बीच नहीं रहता, बल्कि सिस्टम को भी कहानी का हिस्सा बनाता है।

Episode 3 तक आते-आते pacing थोड़ी धीमी महसूस होती है। कहानी में घटनाएं हो रही होती हैं, लेकिन हर घटना कहानी को उतना आगे नहीं धकेलती जितना 50 मिनट के एपिसोड में होना चाहिए। यही वह हिस्सा है जहां कुछ viewers को लगेगा कि छह की जगह पांच या शायद चार-पांच tight episodes में भी बात कही जा सकती थी।

Episode 4 में investigation और larger conspiracy वाला angle फिर से grip बढ़ाता है। यहां शो crime thriller से psychological और social thriller की तरफ ज्यादा महसूस होने लगता है।

Episode 5 tension को फिर ऊपर ले जाता है। Media, public reaction और power structure वाला हिस्सा कहानी के original सवालों को दोबारा सामने लाता है। हालांकि कुछ twists को देखकर हैरानी कम और confirmation ज्यादा महसूस होती है।

Episode 6, यानी finale, करीब 66 मिनट का है। इसका payoff emotional है, लेकिन suspense के स्तर पर वह punch नहीं आता जिसकी पूरी सीरीज उम्मीद बनाती है। Finale अपने मुद्दे को लेकर स्पष्ट है, मगर कहानी के कई मोड़ पहले से पढ़े जा सकते हैं।

यानी pacing का graph सीधा ऊपर नहीं जाता। शुरुआत मजबूत, बीच में थोड़ी सुस्ती, फिर आखिरी दो एपिसोड में दोबारा पकड़।

Writing और Character Arcs

यहां हुंकार का सबसे बड़ा strength और weakness एक ही चीज है।

शो के सवाल अच्छे हैं।

लेकिन उन सवालों के जवाब तक पहुंचने वाली कहानी उतनी नई नहीं है।

Godman, blind faith, sexual abuse, political influence, police pressure, media trial और victim blaming जैसे मुद्दे भारतीय सिनेमा और OTT में पहले कई बार आ चुके हैं। इसलिए सिर्फ विषय की गंभीरता से कहानी fresh नहीं हो जाती।

हुंकार की अच्छी बात यह है कि वह पीड़ित लड़की को सिर्फ रोती हुई, डरी हुई या helpless character बनाकर नहीं छोड़ता। मीनू में गुस्सा है, confidence है और अपने साथ हुए अपराध को लेकर सवाल करने की क्षमता है।

अनीत पड्डा का character इसी वजह से ज्यादा interesting लगता है।

दूसरी तरफ ACP जसलीन का character कहानी को investigation और institutional angle देता है। Fatima Sana Shaikh के पास एक ऐसा character है जो सिर्फ support system नहीं है, बल्कि खुद कहानी को आगे बढ़ाता है।

फिर भी कुछ supporting characters के साथ यही depth नहीं मिलती। शो में कई अच्छे actors हैं, लेकिन हर character को उतनी जगह नहीं मिलती जितनी उनके नाम और talent से उम्मीद होती है। इससे कुछ subplots कहानी को मजबूत करने के बजाय बीच-बीच में filler जैसे लगते हैं।

अगर screenplay को थोड़ा और trim किया जाता और secondary characters के बजाय core conflict को ज्यादा जगह मिलती, तो छह एपिसोड ज्यादा tight महसूस होते।

Performances: किसने बाज़ी मारी?

यहां हुंकार सबसे ज्यादा मजबूत है।

अनीत पड्डा

सैयारा के बाद अनीत पड्डा को एक बिल्कुल अलग emotional space में देखना दिलचस्प है। वहां उनकी आंखों में romance था, यहां उन्हीं आंखों में गुस्सा, डर, confusion और resistance दिखाई देता है।

सबसे अच्छी बात यह है कि कई जगह उन्हें dialogue की जरूरत नहीं पड़ती। Face पर emotion इतना साफ दिखाई देता है कि आपको समझ आ जाता है कि character के अंदर क्या चल रहा है।

मीनू को victim बनाकर छोड़ देने की जगह उन्होंने उसे fighter की तरह निभाया है।

फातिमा सना शेख

ACP जसलीन के रूप में Fatima Sana Shaikh restrained performance देती हैं। वह character को unnecessarily heroic नहीं बनातीं। पुलिस अधिकारी के pressure, frustration और personal stakes को काफी controlled तरीके से निभाया गया है।

उनका और अनीत का contrast शो के लिए काम करता है।

रघुबीर यादव

और फिर आते हैं रघुबीर यादव।

जिस तरह वह बापजी को निभाते हैं, उसमें सबसे ज्यादा असर उनके छोटे gestures का है। उनका चलना, बैठना, सामने वाले को देखना, आवाज का अचानक शांत हो जाना। कई बार वह कुछ नहीं करते और फिर भी scene uncomfortable हो जाता है।

उनकी casting पर अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन performance में उन्होंने character को एक unsettling presence जरूर दी है।

मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब और राम कपूर courtroom portions को weight देते हैं। अर्जुन माथुर भी अपने हिस्से में अच्छे हैं, लेकिन कुछ supporting characters की writing उनके performances को पूरी तरह इस्तेमाल नहीं करती।

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Direction और Making

नित्या मेहरा और करण डी. कपाड़िया ने शो को सिर्फ sensational crime thriller बनाने से बचाया है। कहानी में धर्म और आस्था मौजूद हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल केवल controversy पैदा करने के लिए नहीं किया गया।

सबसे अच्छी चीज इसका atmosphere है।

छोटे शहर, आश्रम, पुलिस स्टेशन, कोर्ट और आसपास का सामाजिक माहौल कहानी को grounded रखते हैं। Locations और cinematography को भी दूसरे reviews ने सीरीज की मजबूत technical चीजों में गिना है।

शो का tone भी ज्यादातर consistent रहता है। यह हर पांच मिनट में shock देने की कोशिश नहीं करता। कई जगह uncomfortable silence को भी जगह देता है।

हालांकि यही restraint कभी-कभी pacing को धीमा भी करता है।

और एक बात साफ है। हुंकार को देखते हुए आपको इसकी तुलना इस genre की पहले की कहानियों से अपने आप होगी। आश्रम जैसे godman dramas और courtroom-based social thrillers की छाया से शो पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाता। कई reviewers ने भी इसके familiar setup और limited novelty की ओर इशारा किया है।

Music, BGM और Title Track

Music यहां कहानी का सबसे बड़ा selling point नहीं है और शायद ऐसा होना जरूरी भी नहीं था।

BGM का काम माहौल बनाने का है, scene को जबरदस्ती बड़ा बनाने का नहीं। जहां silence इस्तेमाल हुआ है, वहां उसका असर ज्यादा आता है।

Title track ऐसा नहीं है कि episode खत्म होते ही दोबारा सुनने का मन करे। लेकिन शो के serious tone के साथ संगीत generally fit बैठता है।

Technical Department

Cinematography और editing दोनों का काम साफ दिखाई देता है।

छोटे शहर का environment सिर्फ background नहीं लगता। आश्रम की visual presentation में एक तरफ श्रद्धा और दूसरी तरफ discomfort दोनों साथ रखने की कोशिश है।

Courtroom scenes में भी camera unnecessarily flashy नहीं होता। इससे actors और dialogue को जगह मिलती है।

Editing थोड़ी और sharp होती तो शो का असर बढ़ सकता था। खासकर mid-season में कुछ portions ऐसे लगते हैं जिन्हें छोटा किया जा सकता था।

Binge-worthy है या नहीं?

अगर आपका सवाल है कि क्या Episode 1 के बाद Episode 2 तुरंत चलाने का मन करेगा? तो हां।

क्या आप पूरे छह एपिसोड एक ही बैठने में देखना चाहेंगे? यह आपकी genre preference पर निर्भर करेगा।

पहले दो episodes काफी जल्दी आपको अंदर खींचते हैं। बीच में थोड़ी patience चाहिए। आखिरी दो episodes फिर से momentum पकड़ते हैं।

सभी episodes एक साथ रिलीज हुए हैं, इसलिए weekly wait की समस्या नहीं है।

मेरे हिसाब से इसे एक ही दिन में खत्म करने की बजाय दो बैठकों में देखना बेहतर रहेगा। करीब छह घंटे का commitment है और बीच के हिस्से को थोड़ा breathing room देने से frustration कम होगी।

क्या काम किया, क्या नहीं

क्या काम किया

  • अनीत पड्डा की performance। Emotion चेहरे पर साफ दिखता है और character को victim तक सीमित नहीं किया गया।
  • फातिमा सना शेख का पुलिस अधिकारी वाला performance। उनके character को कहानी में वास्तविक agency दी गई है।
  • रघुबीर यादव की presence। कम gestures में भी uncomfortable atmosphere बनता है।
  • मुद्दे को सिर्फ crime mystery न रखना। Victim blaming, media narrative, power और faith के सवाल कहानी को ज्यादा बड़ा context देते हैं।

क्या नहीं काम किया

  • Main story predictable है। Genre से परिचित दर्शक कई twists पहले पकड़ सकते हैं।
  • कुछ episodes लंबे लगते हैं। छह episodes और करीब छह घंटे के runtime में screenplay को ज्यादा tight किया जा सकता था।
  • Supporting characters underused हैं। इतने अच्छे actors होने के बावजूद हर character को पर्याप्त depth नहीं मिलती।
  • Genre में नया क्या है, यह सवाल बचा रहता है। विषय जरूरी है, लेकिन presentation हर जगह नई नहीं लगती।

कितने Episode देखकर फैसला करें?

Episode 3 तक देखिए।

पहले episode से आपको इसका tone और subject समझ आ जाएगा। अगर Episode 1 और 2 के बाद भी police investigation, courtroom drama और social thriller वाला setup आपको नहीं पकड़ता, तो आगे अचानक कोई बिल्कुल अलग शो शुरू नहीं होने वाला।

लेकिन Episode 3 तक अगर characters और central conflict में interest बन गया है, तो finale तक जाना ठीक रहेगा। खासकर अनीत पड्डा की performance के लिए।

कैसे देखनी चाहिए, कैसे नहीं

यह family के साथ casual watching वाली series नहीं है।

सीरीज में sexual assault और abuse से जुड़े गंभीर विषय हैं। Adult language का इस्तेमाल है और disturbing situations दिखाई जाती हैं। Sexual violence के references और emotionally uncomfortable scenes भी हैं।

इसलिए इसे बच्चों के साथ देखने से बचना चाहिए।

यह शो sexual violence को glamourize करने के बजाय उसके आसपास के social response और power structure पर बात करने की कोशिश करता है। फिर भी विषय की प्रकृति के कारण कई scenes परेशान करने वाले हो सकते हैं।

Season 2 और आगे क्या?

पहला सीजन अपनी मुख्य कहानी को छह एपिसोड में पूरा करने की कोशिश करता है। इसलिए इसे केवल cliffhanger के लिए बनाया गया शो नहीं कहा जा सकता।

सीजन 2 की कहानी के बारे में फिलहाल कोई स्पष्ट आधिकारिक घोषणा उपलब्ध नहीं है। इसलिए अभी renewal या अगली कहानी को लेकर अनुमान लगाना सही नहीं होगा।

हुंकार की सबसे बड़ी ताकत इसकी कहानी का नया होना नहीं है। इसकी ताकत यह है कि पुराने और बार-बार सामने आने वाले अपराधों पर यह कुछ असहज सवाल फिर से पूछती है।

आखिर कितनी बार किसी बाबा, गुरु या ताकतवर आदमी पर ऐसे आरोप लगेंगे और हम फिर वही सवाल पूछेंगे कि लड़की वहां गई क्यों थी, उसने पहले बताया क्यों नहीं, उसके कपड़े कैसे थे या वह इतनी confident क्यों दिख रही है?

गलत करने वाला गलत है या नहीं, यह तय करने के लिए victim का डरना जरूरी क्यों मान लिया जाता है?

यही हिस्सा हुंकार को सिर्फ एक और आश्रम टाइप crime thriller बनने से बचाता है।

लेकिन दूसरी तरफ, अगर आपने इसी genre की कई फिल्में और series देख रखी हैं तो इसका central mystery आपको बहुत ज्यादा चौंकाएगा नहीं। कहानी के कई मोड़ पहले से दिखाई देने लगते हैं और छह episodes का runtime कई जगह unnecessary महसूस होता है।

फिर भी अनीत पड्डा की आंखों में दिखाई देने वाले emotions, फातिमा सना शेख की controlled performance और रघुबीर यादव की unsettling presence शो को संभाल लेती है।

3 स्टार इसलिए कि शो में दम है, कलाकारों में दम है और सवाल जरूरी हैं। लेकिन कहानी में वह नया punch नहीं है जो इसे इसी genre की बाकी कहानियों से अलग कर दे।

3.5 out of 5
One-time watch

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