Reporting Live Review: कहानी में दम है, लेकिन कितना?
| Title | Reporting Live |
|---|---|
| Director | Dhruv Tripathi |
| Writer | Mihir Jadhav, Dhruv Tripathi |
| Cast | Parineeti Chopra, Deven Bhojani, Amol Palekar, Adil Hussain, Shekhar Suman |
| Genre | Crime, Thriller, Drama |
| Language | Hindi; Tamil, Telugu |
| Runtime | 1h 56m |
| Certificate | UA 13+ |
| Released | October 9, 2026 |
| Where to watch | Netflix |
| Our score | 2.5 / 5 |
परिणीति चोपड़ा की फिल्म Reporting Live एक ऐसे मुद्दे पर बनी है, जिसे देखकर आपके मन में भी सवाल उठ सकता है। जब पत्रकार किसी गलत काम का सच सामने लाने की कोशिश करते हैं, तो क्या उन्हें सच दिखाने दिया जाता है? या फिर खबर दिखाने से पहले ही उन्हें चुप कराने की कोशिश शुरू हो जाती है?

फिल्म की कहानी पत्रकारिता और अवैध रेत खनन के इर्द-गिर्द घूमती है। विषय अच्छा है और इसमें एक दिलचस्प thriller बनने की गुंजाइश भी है। लेकिन सिर्फ गंभीर मुद्दा उठा लेने से फिल्म अच्छी नहीं हो जाती। कहानी को भी दर्शकों को बाँधकर रखना पड़ता है।
तो क्या Reporting Live ऐसा कर पाती है? चलिए, इसकी कहानी, कलाकारों और कमज़ोरियों पर सीधे बात करते हैं।
कहानी क्या है?
कहानी संध्या यादव नाम की एक पत्रकार की है, जिसका किरदार परिणीति चोपड़ा ने निभाया है। संध्या अपने cameraman विनोद शर्मा के साथ एक गाँव में पुल गिरने की घटना की रिपोर्टिंग करने पहुँचती है।
मामला देखने में एक हादसा लगता है, लेकिन पड़ताल आगे बढ़ती है तो अवैध रेत खनन का मामला सामने आता है। अब संध्या और विनोद के सामने सवाल है कि इस गड़बड़ी के पीछे कौन है और सच को लोगों तक कैसे पहुँचाया जाए।
यहाँ फिल्म एक ऐसे मुद्दे को छूती है, जिसके बारे में बात होनी चाहिए। लेकिन ऐसी कहानी में जाँच का हर कदम समझ में आना चाहिए। दर्शक को भी सुराग जोड़ने का मौका मिलना चाहिए। अगर कहानी खुद ही सारे जवाब आसानी से दे दे, तो suspense का मज़ा कम हो जाता है।
Direction और कहानी की लिखाई
फिल्म का विषय अच्छा है, लेकिन इसे पर्दे पर उतारना आसान नहीं था। पत्रकारिता की दुनिया में खबर जुटाना, सबूतों की जाँच करना और चैनल के दबाव का सामना करना, इन सबको कहानी में ठीक से जगह देनी पड़ती है।
यहीं Reporting Live को और मेहनत करने की ज़रूरत थी। उपलब्ध समीक्षाओं में भी कहानी के कुछ मोड़ों के अनुमानित होने और जाँच को बहुत आसान दिखाने की आलोचना हुई है।
मेरे हिसाब से इस तरह की फिल्म में सिर्फ यह बताना काफी नहीं कि पत्रकारों के रास्ते में मुश्किलें आती हैं। उन मुश्किलों को कहानी के भीतर सही तरह से दिखाना भी जरूरी है। वरना मुद्दा तो समझ आता है, लेकिन कहानी का असर कम रह जाता है।
परिणीति चोपड़ा और बाकी कलाकार
परिणीति चोपड़ा संध्या यादव की भूमिका में हैं। उनका किरदार सच सामने लाने की कोशिश करता है और कहानी का मुख्य आधार है। लेकिन किसी पत्रकार का किरदार तभी याद रहता है, जब उसके फैसलों और काम करने के तरीके को भी अच्छी तरह लिखा गया हो। उपलब्ध समीक्षाओं में उनकी casting और किरदार को लेकर अलग-अलग राय देखने को मिली है।
देवेन भोजानी विनोद शर्मा की भूमिका में हैं। कुछ समीक्षकों ने उनके काम की खास तारीफ की है। यह किरदार कहानी में जरूरी है, क्योंकि रिपोर्टिंग के दौरान cameraman की भूमिका भी उतनी ही अहम होती है। वह सिर्फ कैमरा चलाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि मौके पर मौजूद एक गवाह भी होता है।
आदिल हुसैन एक वरिष्ठ संपादकीय अधिकारी की भूमिका में हैं। उनका किरदार उस स्थिति को दिखाता है जहाँ खबर की सच्चाई और चैनल के हितों के बीच टकराव हो सकता है।
शेखर सुमन चैनल के मालिक की भूमिका में हैं। कहानी में उनके किरदार के जरिए यह सवाल उठता है कि जब किसी खबर से चैनल को परेशानी हो सकती है, तो मालिक सच का साथ देगा या अपने फायदे का?
अमोल पालेकर भी फिल्म का हिस्सा हैं। बाकी कलाकारों में नासर, शाश्वत चटर्जी और पितोबाश त्रिपाठी शामिल हैं।
Music और BGM
फिल्म का मुख्य जोर गानों पर नहीं, बल्कि अपराध की जाँच और पत्रकारिता पर है। इसलिए यहाँ background music का काम कहानी में तनाव बनाए रखना है।
लेकिन उपलब्ध जानकारी से गानों और BGM की गुणवत्ता पर पक्की राय बनाना मुश्किल है। बिना फिल्म देखे संगीत को शानदार या खराब कहना सही नहीं होगा।
Visuals और कैमरा
इस फिल्म में कैमरे का अपना महत्व है, क्योंकि कहानी एक पत्रकार और cameraman के काम से जुड़ी है। गाँव में रिपोर्टिंग और खबर के पीछे की पड़ताल को ऐसा दिखना चाहिए कि दर्शक उस माहौल को समझ सकें।
हालाँकि, उपलब्ध समीक्षाओं में cinematography और editing की इतनी विस्तृत जानकारी नहीं मिली कि इन दोनों को लेकर कोई ठोस फैसला दिया जा सके।
Dialogues और Writing
पत्रकारिता पर बनी फिल्म में संवाद सीधे होने चाहिए, लेकिन इतने भी सीधे नहीं कि हर किरदार सिर्फ अपना संदेश सुनाने लगे।
कहानी में असली मज़ा तब आता है, जब पत्रकारों के फैसलों के पीछे उनकी मजबूरी, डर और जिम्मेदारी भी समझ आती है। Reporting Live के बारे में प्रकाशित कुछ समीक्षाओं में लेखन को बहुत सरल और कहानी के कुछ हिस्सों को अनुमानित बताया गया है।
यही इस फिल्म के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। अच्छा विषय चुनना शुरुआत है। उसे दिलचस्प कहानी में बदलना अलग काम है।
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क्या अच्छा है?
- पत्रकारिता और अवैध रेत खनन जैसे गंभीर मुद्दे को उठाती है।
- देवेन भोजानी के अभिनय की कुछ समीक्षकों ने तारीफ की है।
- खबर की सच्चाई और चैनल के हितों के बीच टकराव दिखाने की कोशिश करती है।
क्या कमज़ोर है?
- कहानी के कुछ मोड़ों का पहले से अंदाज़ा लग सकता है।
- जाँच की प्रक्रिया को और विश्वसनीय बनाने की ज़रूरत थी।
- पत्रकारिता की जटिलताओं को पूरी गहराई से दिखाने में फिल्म पीछे रह जाती है।
क्या परिवार के साथ देख सकते हैं?
Netflix की सूची में फिल्म के लिए UA 13+ rating दी गई है। इसमें अपराध और गंभीर सामाजिक मुद्दे हैं। छोटे बच्चों के साथ देखने से पहले आधिकारिक content rating की जानकारी जाँच लेना बेहतर होगा।
Reporting Live का मुद्दा अच्छा है, लेकिन कहानी में वह बात नहीं बन पाती जिसकी मुझे उम्मीद थी। पत्रकारिता और सच की लड़ाई देखना पसंद है, तो इसे एक बार मौका दे सकते हैं। लेकिन बहुत रोमांचक कहानी की उम्मीद लेकर मत बैठिए। मेरी राय में, यह फिल्म One-Time Watch है।



